भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा ₹26 करोड़ का ओवरब्रिज? उद्घाटन के 15 दिन बाद ही बीच से फटने लगा पुल, ग्रामीणों में भारी आक्रोश

 भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा ₹26 करोड़ का ओवरब्रिज? उद्घाटन के 15 दिन बाद ही बीच से फटने लगा पुल, ग्रामीणों में भारी आक्रोश

राज्य ब्यूरो मोहम्मद आसिफ खान संपादक वीरेंद्र कुमार

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भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा ₹26 करोड़ का ओवरब्रिज? उद्घाटन के 15 दिन बाद ही बीच से फटने लगा पुल, ग्रामीणों में भारी आक्रोश

 

राजनांदगांव: छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले से सरकारी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और करोड़ों रुपये के बजट के दुरुपयोग की एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। दक्षिण पूर्व रेलवे द्वारा ग्राम बरगा के समीप लगभग 26 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से नवनिर्मित ओवरब्रिज मानसून की पहली बौछार भी नहीं झेल सका। बीते जून महीने में ही बड़े तामझाम के साथ शुरू हुआ यह ओवरब्रिज महज कुछ सप्ताह के भीतर ही जगह-जगह से दरकने लगा है। स्थिति इतनी भयावह है कि पुल बीच से दो हिस्सों में बंटता नजर आ रहा है, जिससे स्थानीय ग्रामीणों और राहगीरों में खौफ का माहौल है।

 

ग्रामीणों का गंभीर आरोप: ‘दो हिस्सों में बंट रहा पुल, कभी भी हो सकता है बड़ा हादसा’यह ओवरब्रिज क्षेत्र के सैकड़ों ग्रामीणों के लिए रोजाना आवागमन का मुख्य जरिया है। पहली ही बारिश में पुल के मुख्य ढांचे में आई गहरी और चौड़ी दरारों ने इसकी निर्माण सामग्री और इंजीनियरिंग मानकों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने के बाद भी घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। आक्रोशित ग्रामीणों ने मामले की तत्काल उच्च स्तरीय तकनीकी जांच कराने, दोषी निर्माण एजेंसी व अधिकारियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने और पुल की तुरंत मरम्मत कराने की पुरजोर मांग की है।

आलीवारा ओवरब्रिज की भी हालत खस्ता, धंसने लगी हैं सड़कें

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, भ्रष्टाचार और लापरवाही का यह आलम केवल बरगा ओवरब्रिज तक ही सीमित नहीं है। इसके पास ही स्थित आलीवारा रेलवे ओवरब्रिज की स्थिति भी बेहद चिंताजनक बनी हुई है। यहां पहली ही बरसात के बाद सड़क के नीचे बड़े-बड़े खोखले गड्ढे (सिंकहोल) बनने लगे हैं और ब्रिज के किनारों का हिस्सा तेजी से बैठ (धंस) गया है। ग्रामीणों का सवाल है कि यदि पहली ही बारिश में पुलों और सड़कों की यह दुर्दशा है, तो आगे आने वाले भारी मानसून में यह ढांचा कैसे टिक पाएगा?

रेलवे इंजीनियर की सफाई: ‘खतरे की बात नहीं, यह सिर्फ माइनर सेटलमेंट है’इस पूरे मामले में चौतरफा घिरने के बाद रेलवे विभाग और निर्माण एजेंसी ने आनन-फानन में प्रभावित हिस्सों पर पैचवर्क और मरम्मत का काम शुरू करवा दिया है। वहीं, मामले पर सफाई देते हुए रेलवे के एक वरिष्ठ इंजीनियर ने कहा:”दरारें आने के वास्तविक कारणों की पूरी तकनीकी जांच कराई जाएगी।

फिलहाल किसी भी प्रकार के खतरे की कोई बात नहीं है। जब कोई नया ढांचा तैयार होता है, तो पहली बारिश के दौरान मिट्टी और कंक्रीट में थोड़ा बहुत ‘सेटलमेंट’ (दबाव) होना एक सामान्य प्रक्रिया है, यह बेहद माइनर (मामूली) है। फिर भी हमारी टेक्निकल टीम और उच्च अधिकारी मौके का मुआयना कर पूरे मामले की विस्तृत जांच करेंगे।”बहरहाल, अधिकारियों की इस ‘माइनर सेटलमेंट’ वाली दलील से स्थानीय लोग संतुष्ट नहीं हैं। जनता का साफ कहना है कि ₹26 करोड़ की लागत से बने सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का चंद दिनों में यह हाल होना सीधे तौर पर जनता के पैसे की बर्बादी और उनकी जान से खिलवाड़ है।