कोरबा में सुरक्षा व्यवस्था तार-तार: पिता की हत्या का सजायाफ्ता कैदी पैरोल से फरार होकर 6 साल तक ठेका कंपनी में करता रहा नौकरी, पुलिस ने दबोचा
राज्य ब्यूरो मोहम्मद आसिफ खान संपादक वीरेंद्र कुमार
*******************************
कोरबा में सुरक्षा व्यवस्था तार-तार: पिता की हत्या का सजायाफ्ता कैदी पैरोल से फरार होकर 6 साल तक ठेका कंपनी में करता रहा नौकरी, पुलिस ने दबोचा
कोरबा। औद्योगिक नगरी कोरबा के संयंत्रों में मजदूरों के चरित्र सत्यापन और सुरक्षा नियमों की खुलेआम अनदेखी का एक बड़ा मामला सामने आया है। बालको पुलिस ने पिता की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा पाए और पैरोल से छह साल से फरार चल रहे एक शातिर कैदी को गिरफ्तार किया है। हैरत की बात यह है कि फरार रहने के दौरान यह कैदी फर्जीवाड़ा कर एक औद्योगिक संयंत्र की ठेका कंपनी में बकायदा नौकरी कर रहा था।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला बालको थाना क्षेत्र के परसाभाठा का है। वर्ष 2007 में दरोगा कुर्मे नामक व्यक्ति की उनके घर में हत्या कर दी गई थी। पुलिस जांच में मृतक के दो बेटों—देवानंद कुर्मे और सूरज कुर्मे की संलिप्तता पाई गई थी। कोर्ट ने दोनों भाइयों को दोषी पाते हुए धारा 302, 449 और 34 के तहत आजीवन कारावास और 12-12 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई थी। इसके बाद दोनों को बिलासपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया था।पैरोल मिलते ही हो गए फरारवर्ष 2020 में दोनों भाइयों ने पैरोल के लिए आवेदन किया था। 7 अप्रैल 2020 को उन्हें पैरोल पर रिहा किया गया और 1 मई 2020 को उन्हें वापस जेल में सरेंडर करना था। लेकिन पैरोल अवधि खत्म होने के बाद भी दोनों भाई वापस जेल नहीं लौटे और फरार हो गए। करीब पांच साल बाद इस लापरवाही की शिकायत बालको थाने में दर्ज कराई गई।
पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर दबोचा
कोरबा एसपी सिद्धार्थ तिवारी के निर्देश, एएसपी लखन पटले और सीएसपी प्रतीक चतुर्वेदी के मार्गदर्शन में बालको थाना प्रभारी युवराज तिवारी की टीम फरार कैदियों की तलाश में जुटी थी। इसी बीच मुखबिर से सूचना मिली कि आरोपी देवानंद कुर्मे अपने घर पर आया हुआ है। पुलिस ने तत्काल घेराबंदी कर दबिश दी और उसे गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया है, जबकि उसके दूसरे फरार भाई सूरज की तलाश अभी जारी है।
सुरक्षा और चरित्र सत्यापन पर खड़े हुए बड़े सवाल
गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में जो खुलासा हुआ, उसने औद्योगिक संयंत्रों की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। आरोपी देवानंद ने बताया कि पैरोल से फरार होने के बाद वह पहले अपने गांव बलीदा गया और फिर कोरबा लौट आया। यहां उसने एक औद्योगिक संयंत्र के भीतर संचालित ठेका कंपनी में नौकरी हासिल कर ली।
चौंकाने वाली बात यह है कि नौकरी के लिए उसने अपने सभी आवश्यक दस्तावेज भी जमा किए थे।नियमों के मुताबिक, संयंत्रों के भीतर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के प्रवेश को रोकने के लिए हर मजदूर का पुलिस वेरिफिकेशन (चरित्र सत्यापन) अनिवार्य है। लेकिन एक कत्ल के सजायाफ्ता मुल्जिम का संयंत्र के अंदर सालों तक काम करना प्रबंधन और ठेका कंपनियों की भारी लापरवाही को उजागर करता है।





