छत्तीसगढ़ में ‘पतिराज’ पर पूर्ण विराम: महिला जनप्रतिनिधियों के कामकाज में परिजनों के हस्तक्षेप पर सरकार ने लगाई कानूनी रोक

 छत्तीसगढ़ में ‘पतिराज’ पर पूर्ण विराम: महिला जनप्रतिनिधियों के कामकाज में परिजनों के हस्तक्षेप पर सरकार ने लगाई कानूनी रोक

राज्य ब्यूरो मोहम्मद आसिफ खान संपादक वीरेंद्र कुमार

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छत्तीसगढ़ में ‘पतिराज’ पर पूर्ण विराम: महिला जनप्रतिनिधियों के कामकाज में परिजनों के हस्तक्षेप पर सरकार ने लगाई कानूनी रोक

 

रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार ने महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक और कड़ा कदम उठाया है। प्रदेश के नगरीय निकायों में अब कोई भी निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधि अपने पति, पुत्र, पुत्री, भाई, बहन या किसी भी अन्य निकट संबंधी को अपना परोक्ष प्रतिनिधि या समन्वयक (Representative) नियुक्त नहीं कर पाएगी।

नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने इसके लिए नियमों में संशोधन करते हुए राजपत्र (Gazette) में आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि जिस पद पर जनता ने महिला को चुना है, उसका दायित्व और कार्यभार स्वयं उसी महिला जनप्रतिनिधि को संभालना होगा।

क्यों लिया गया यह बड़ा फैसला?

प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और नगरीय प्रशासन मंत्री अरुण साव ने इस फैसले की पृष्ठभूमि स्पष्ट करते हुए बताया कि राजनीति में महिला आरक्षण का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को मुख्यधारा में लाना और उन्हें नेतृत्व सौंपना था।

हालांकि, व्यावहारिक धरातल पर यह उद्देश्य धूमिल हो रहा था।विभाग को लगातार ऐसी शिकायतें मिल रही थीं कि नगरीय निकायों के कार्यालयों, बैठकों और सरकारी कामकाज में महिला पार्षदों या अध्यक्षों के स्थान पर उनके पति (जिन्हें आम बोलचाल में ‘पार्षद पति’ कहा जाता है) या अन्य परिजन हस्तक्षेप कर रहे थे। फाइलों पर हस्ताक्षर से लेकर निर्णयों तक में परिजनों का दबदबा रहता था। इस विसंगति को दूर करने और महिलाओं को उनका वास्तविक अधिकार दिलाने के लिए सरकार को यह सख्त कदम उठाना पड़ा है।

महिला जनप्रतिनिधियों के लिए क्यों उपयोगी है यह बदलाव?

इस नए नियम के लागू होने से छत्तीसगढ़ की स्थानीय राजनीति और कार्यशैली में व्यापक बदलाव देखने को मिलेंगे:सक्रिय नेतृत्व: महिला जनप्रतिनिधियों को अब अपने क्षेत्र के विकास कार्यों, फाइलों के निपटान और सरकारी बैठकों में अनिवार्य रूप से खुद उपस्थित होना पड़ेगा।

आत्मविश्वास में वृद्धि:

जब महिलाएं खुद निर्णय लेंगी और प्रशासनिक अधिकारियों से सीधे संवाद करेंगी, तो उनका राजनीतिक आत्मविश्वास और समझ बढ़ेगी।

स्वतंत्र और जवाबदेह प्रशासन:

क्षेत्र की जनता को अब एक स्वतंत्र, पारदर्शी और सीधे जवाबदेह नेतृत्व मिलेगा। बिचौलियों या परोक्ष प्रतिनिधियों की भूमिका खत्म होने से भ्रष्टाचार और असमंजस की स्थिति समाप्त होगी।

वास्तविक सशक्तिकरण:

यह पहल उन महिलाओं के लिए एक बड़ा अवसर बनेगी जो वास्तव में समाज सेवा और राजनीति में अपनी पहचान बनाना चाहती हैं।

170 से ज्यादा निकायों के 3,000+ प्रतिनिधियों पर सीधा असर

छत्तीसगढ़ में वर्तमान में 170 से अधिक नगरीय निकाय (नगर निगम, नगरपालिका और नगर पंचायत) हैं। इन सभी निकायों को मिलाकर कुल लगभग 9,500 पार्षद चुने जाते हैं। नियमों के मुताबिक स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए न्यूनतम 30 प्रतिशत आरक्षण की बाध्यता है।

इस लिहाज से प्रदेश में महिला पार्षदों और अध्यक्षों की संख्या 3,000 से भी अधिक है। सरकार के इस फैसले का सीधा असर इन 3,000 से ज्यादा महिला जनप्रतिनिधियों और उनके परिवारों पर पड़ेगा।भविष्य में इस नियम के कड़ाई से पालन होने से छत्तीसगढ़ के नगरीय निकायों की कार्यशैली अधिक लोकतांत्रिक, अनुशासित और महिला-नेतृत्व को वास्तविक रूप से सम्मान देने वाली साबित होगी।