बेगुनाही के लिए अभियुक्त को पेश करना होगा सबूत साक्ष्य पेश नही करने की स्थिति में खानी होगी जेल की हवा

 बेगुनाही के लिए अभियुक्त को पेश करना होगा सबूत साक्ष्य पेश नही करने की स्थिति में खानी होगी जेल की हवा

राज्य ब्यूरो मोहम्मद आसिफ खान संपादक बीरेंद्र कुमार चौधरी

 

 

 

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि अभियुक्त अपनी व्यक्तिगत जानकारी में मामले के तथ्यों को समझाने में विफल रहता है तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के तहत उसके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जा सकता है।

दल्लीराजहरा निवासी दिनेश ताराम ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। सत्र न्यायाधीश दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा ने आइपीसी की धारा 302 के तहत अपराध के लिए दोषी ठहराया गया है और आजीवन कारावास और 500 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। जुर्माना ना भरने पर दो महीने के लिए सजा भुगतने का निर्देश कोर्ट ने दिया है। 12 अप्रैल 2019 को 7.30 बजे याचिकाकर्ता ने अपनी पत्नी साधना भास्कर पर गैंती (कुदाल) से हमला किया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। तकरीबन आठ वर्ष पूर्व दोनों ने प्रेम विवाह किया था। आरोपित को अपनी पत्नी साधना भास्कर के चरित्र पर सदैव संदेह रहता था, जिसकी जानकारी मृतिका ने अपने भाई दुष्यंत भास्कर को दी थी।

12 अप्रैल 2019 को आरोपित ने दुष्यंत भास्कर को उसके मोबाइल फोन पर फोन किया कि उसकी पत्नी साधना भास्कर का किसी अन्य व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग चल रहा था और इसी कारण से उसने अपनी पत्नी की गैंती से हत्या कर दी है। सूचना मिलने पर दुष्यन्त भास्कर अपने मित्र युवराज सिंह के साथ घटना स्थल झापारा पहुंचे, जहां उन्होंने देखा कि साधना आरोपित के घर के आंगन में मृत पड़ी थी। उपरोक्त घटना की जानकारी दुष्यंत भास्कर ने थाना सुकमा में दी। याचिकाकर्ता ने कहा है कि वर्तमान मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं है और अभियोजन का पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित है।

कोर्ट की टिप्पणी

 

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस रजनी दुबे ने कहा कि साक्ष्यों की एक श्रृंखला इतनी पूर्ण होनी चाहिए कि अभियुक्त की बेगुनाही के अनुरूप निष्कर्ष के लिए कोई उचित आधार न छूटे और यह दर्शाया जाए कि सभी मानवीय संभावनाओं में कार्य अभियुक्त द्वारा किया गया होगा। साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 का उपयोग कानून के सुस्थापित नियम को कमजोर करने के लिए नहीं किया जा सकता है, जो कि मामले की एक बहुत ही असाधारण श्रेणी को छोड़कर बोझ अभियोजन पक्ष पर है और कभी भी स्थानांतरित नहीं होता है। साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 उन मामलों पर लागू होगी जहां अभियोजन पक्ष उन तथ्यों को स्थापित करने में सफल रहा है जिनसे कुछ अन्य तथ्यों के अस्तित्व के संबंध में उचित निष्कर्ष निकाला जा सकता है जो अभियुक्त के विशेष ज्ञान के भीतर हैं।

 

कोर्ट के खारिज की अपील

 

विश्वसनीयता की कसौटी पर न्यायेतर स्वीकारोक्ति को स्वीकार किया जा सकता है और यदि यह विश्वसनीयता की कसौटी पर खरा उतरता है तो यह दोषसिद्धि का आधार हो सकता है। सीआरपीसी की धारा 313 के अनुसार हमारी सुविचारित राय है कि ट्रायल कोर्ट ने धारा 302 के तहत अपराध के लिए अपीलकर्ता को सही और सज़ा सुनाई है। उपरोक्त कारणों से अपीलकर्ता दिनेश ताराम की ओर से दायर आपराधिक अपील खारिज की जाती है। वह जेल में है, वह संबंधित ट्रायल कोर्ट के आदेश के अनुसार सजा काटेगा।

 

आदेश की कापी ट्रायल कोर्ट को दे

 

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि इस फैसले की एक प्रति के साथ ट्रायल कोर्ट के रिकार्ड को अनुपालन और आवश्यक कार्रवाई के लिए तुरंत संबंधित ट्रायल कोर्ट को वापस भेजा जाए।