छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में मरमेड बेबी’ का हुआ जन्म से ही दोनों पैर जलपरी जैसे जुड़े हुए थे, तीन घंटे बाद हुई मौत

 छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में मरमेड बेबी’ का हुआ जन्म से ही दोनों पैर जलपरी जैसे जुड़े हुए थे, तीन घंटे बाद हुई मौत

राज्य ब्यूरो मोहम्मद आसिफ खान संपादक वीरेंद्र कुमार

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धमतरी में मरमेड सिंड्रोम से पीड़ित बच्चे का जन्म हुआ. बच्चे के जन्म के तीन घंटे के बाद हुई मौत हो गई. बच्चे के दौनों पैर जलपरी की तरप आपस में जुड़े हुए थे. 28 वर्षीय महिला का यह दूसरा बच्चा था. डॉक्टर्स ने इसे मरमेड सिंड्रोम या सिरेनोमेलिया बताया.

 

धमतरी।छत्तीसगढ़ के धमतरी जिला अस्पताल में मरेड सिंड्रोम से पीड़ित एक बच्चे का जन्म हुआ. हालांकि जन्म के लगभग 3 घंटे के बाद ही मौत हो गई. नवजात के दोनों पैर आपस में जुड़े हुए थे. मरमेड बेबी जलपरी की तरह नजर आ रहा था. महिला का यह दूसरा बच्चा था. डॉक्टर्स ने इसे मरमेड सिंड्रोम या सिरेनोमेलिया बताया. डॉक्टरों का कहना है कि यह रियर केस बताया.

 

8 महीने की प्रेग्नेंट थी महिला

जानकारी के अनुसार, लेबर पेन के बाद 8 महीने की प्रेग्नेंट महिला को बुधवार सुबह धमतरी जिला अस्पताल में भर्ती किया गया था. जांच के बाद डॉक्टर्स ने डिलीवरी करने का फैसला लिया गया. डिलीवरी के बाद डॉक्टरों ने जो देखा वो हैरान करने वाला था. डॉक्टर्स ने इसे मरमेड सिंड्रोम या सिरेनोमेलिया बताया. दुनिया में ऐसे महज 300 केसेस सामने आए हैं.

 

छत्तीसगढ़ का पहला केस

डॉक्टरों ने बताया कि इस तरह के बच्चों में जन्म के बाद लिंग का पता नहीं चल पाता. डॉक्टरों ने बताया कि ऐसे बच्चों का जीवनकाल आमतौर पर बहुत कम होता है. यह छत्तीसगढ़ का पहला और भारत का पांचवांव केस है. महिला की डिलीवरी कराने वाली डॉक्टर रागिनी सिंह ठाकुर ने बताया कि बच्चों के दोनों पैर जलपरी की तरह आपस में जुड़े हुए थे. बच्चे का ऊपरी हिस्सा जैसे आंख, नाक और हृदय विकसित थे, लेकिन रीढ़ की हड्डी से नीचे का हिस्सा जुड़ा हुआ था. बच्चे का वजन केवल 800 ग्राम था.

 

नहीं चला असामान्यता का पता

आमतौर पर सोनोग्राफी में ही ऐसा असामान्यता का पता चल जाता है, लेकिन इस मामले में सीधे डिलीवरी के बाद जानकारी सामने आई. उन्होंने बताया कि उचित पोषण की कमी, मां से बच्चे तक अनुचित रक्त संचार या भ्रूण का पर्यावरणीय टेराटोजेन के संपर्क में आने से यह स्थिति उत्पन्न हो सकती है. मरमेड सिंड्रोम की स्थिति इतनी गंभीर होती है कि अधिकतर बच्चे मृत पैदा होते हैं, यदि जीवित भी होते हैं तो उपचार के बावजूद कुछ घंटे या अधिकतम कुछ दिन ही जीवित रह पाते हैं. इसमें शिशु की मृत्यु दर इस स्थिति में लगभग शत-प्रतिशत मानी जाती है.