छत्तीसगढ़ का पहला तिहार हरेली: गांव से शहर तक बिखरे परंपरा और खुशहाली के रंग

 छत्तीसगढ़ का पहला तिहार हरेली: गांव से शहर तक बिखरे परंपरा और खुशहाली के रंग

राज्य ब्यूरो मोहम्मद आसिफ खान संपादक वीरेंद्र कुमार

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छत्तीसगढ़ का पहला तिहार हरेली: गांव से शहर तक बिखरे परंपरा और खुशहाली के रंग

 

 

 

छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति का प्रतीक और साल का पहला तिहार ‘हरेली’ बुधवार को पूरे प्रदेश में पारंपरिक हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। खेतों में धान की रोपाई पूरी होने के बाद चारों ओर बिखरी हरियाली के बीच यह त्योहार प्रकृति, कृषि और मवेशियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का जरिया है।

आधुनिकता के इस दौर में भी हरेली का यह उत्सव नई पीढ़ी को अपनी मिट्टी और जड़ों से जोड़ने का एक अनुपम अवसर बन रहा है।

औजारों की पूजा में छिपा श्रम का सम्मान

हरेली के पावन अवसर पर सुबह से ही गांवों और शहरों के घरों में उत्सव का माहौल है। किसान अपने सबसे बड़े मददगार—हल (नांगर), कुदाली, रापा, गैंती और फावड़े को धोकर साफ करते हैं। इसके बाद चावल, फूल, धूप-दीप और चंदन से इनकी विशेष पूजा की जाती है। यह परंपरा छत्तीसगढ़ की संस्कृति में श्रम और कृषि उपकरणों के प्रति गहरे सम्मान को दर्शाती है, जहां धरती माता और अन्नदेव का आभार जताया जाता है।

गेड़ी पर संतुलन:

बचपन के खूबसूरत पलत्योहार का सबसे मुख्य और रोमांचक आकर्षण बांस से बनी ‘गेड़ी’ है। बांस की लंबी लाठियों पर लकड़ी का पैदान लगाकर तैयार की जाने वाली गेड़ी पर चढ़कर बच्चे और युवा गलियों में घूम रहे हैं। प्राचीन समय में कीचड़ और पानी से भरे रास्तों से सुरक्षित गुजरने की यह व्यावहारिक कला आज एक बेहद लोकप्रिय लोक-खेल बन चुकी है। गेड़ी पर संतुलन बनाते बच्चों की टोली त्योहार में बचपन के खूबसूरत रंग भर रही है।

ताकत और तकनीक का संगम:

नारियल फेंक स्पर्धागांवों के चौपालों और मैदानों में पारंपरिक ‘नारियल फेंक’ स्पर्धा का आयोजन किया जा रहा है। इस खेल में युवाओं का दमखम देखने लायक है। नारियल फेंकने की इस कला में केवल शारीरिक ताकत ही नहीं, बल्कि सही दिशा और संतुलन की तकनीक भी जीत तय करती है।

इसके साथ ही घरों में गुड़ के स्वादिष्ट चीले, गुलगुला भजिया और अन्य पारंपरिक छत्तीसगढ़ी व्यंजन बनाए जा रहे हैं, जिसकी खुशबू से हर घर महक उठा है।

अनिष्ट से सुरक्षा और आरोग्य की अनूठी परंपराएं

हरेली का त्योहार केवल खेल और पकवानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आरोग्यता और सुरक्षा से जुड़े कई पारंपरिक पहलू भी शामिल हैं:मवेशियों को औषधि: गाय, बैल और भैंसों को मौसमी बीमारियों व संक्रमण से बचाने के लिए नमक और ‘बगरंडा’ (अंडी) का पत्ता खिलाया जाता है।

चौखट पर नीम और कील: बुरी नजर और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा के लिए लोहार घर-घर जाकर मुख्य द्वार की चौखट पर नीम की पत्तियां लगाते हैं और लोहे की कील ठोंकते हैं।गोबर से पारंपरिक चित्रकारी: राउत और बैगा परंपरा के अनुसार, घरों के मुख्य दरवाजों के बाहर गोबर से विशेष आकृतियाँ बनाई जाती हैं, जिसे अनिष्ट से बचाने वाला सुरक्षा कवच माना जाता है।हरेली का यह त्योहार छत्तीसगढ़ के जनजीवन में प्रकृति के प्रति प्रेम, भाईचारे और लोक-परंपराओं को जीवंत रखने का एक सशक्त माध्यम है।