छत्तीसगढ़ में शोक की लहर: विश्व प्रसिद्ध पंडवानी गायिका पद्म विभूषण तीजन बाई का रायपुर एम्स में निधन
राज्य ब्यूरो मोहम्मद आसिफ खान संपादक वीरेंद्र कुमार
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छत्तीसगढ़ में शोक की लहर: विश्व प्रसिद्ध पंडवानी गायिका पद्म विभूषण तीजन बाई का रायपुर एम्स में निधन
दुर्ग।छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को वैश्विक स्तर पर एक नई और अमिट पहचान दिलाने वाली अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पंडवानी गायिका पद्म विभूषण तीजन बाई का रविवार सुबह 3:15 बजे रायपुर स्थित एम्स (AIIMS) अस्पताल में इलाज के दौरान निधन हो गया। वे 70 वर्ष की थीं। तीजन बाई पिछले लंबे समय से गंभीर रूप से अस्वस्थ चल रही थीं और डॉक्टरों की देखरेख में उनका इलाज जारी था। उनके निधन की खबर फैलते ही छत्तीसगढ़ समेत पूरे देश के कला, संस्कृति और संगीत जगत में शोक की गहरी लहर दौड़ गई है।
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सामाजिक बेड़ियों को तोड़कर बनाई पहचान
तीजन बाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में एक बेहद साधारण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्हें महाभारत की कथाएं सुनने और उन्हें गाने का गहरा शौक था। उस दौर में महिलाओं के लिए पंडवानी की ‘कापालिक शैली’ (जिसमें खड़े होकर और अभिनय करते हुए प्रस्तुति दी जाती है) में गाना पूरी तरह वर्जित माना जाता था। सामाजिक विरोध, पारिवारिक पाबंदियों और भारी आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपने जुनून को जिंदा रखा। उन्होंने महज 13 साल की उम्र में पहली बार चंद्रखुरी में मंच पर अपनी प्रस्तुति देकर इस रूढ़िवादी परंपरा को तोड़ा और कला जगत में एक नए अध्याय की शुरुआत की।

देश-विदेश में बजाया छत्तीसगढ़ी लोककला का डंका
दुर्ग जिले की रहने वाली तीजन बाई ने अपनी अद्भुत गायन शैली, बुलंद आवाज, दमदार शारीरिक भाषा और सशक्त अभिनय के दम पर पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उन्होंने महाभारत की कथाओं को अपनी अनूठी शैली में प्रस्तुत कर न केवल भारत, बल्कि अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, रूस, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे कई देशों के लाखों दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।
तंबूरे को कभी धनुष, कभी गदा तो कभी रथ का पहिया बनाकर पेश करने का उनका अंदाज विश्वभर में सराहा गया।पद्मश्री से पद्म विभूषण तक का सफरकला और लोक संस्कृति के क्षेत्र में उनके अतुलनीय और अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें देश के कई सर्वोच्च नागरिक और कला सम्मानों से नवाजा गया:पद्मश्री (1988)संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995)पद्मभूषण (2003)पद्म विभूषण (2019)सांस्कृतिक धरोहर का अवसानतीजन बाई केवल एक लोकगायिका नहीं थीं, बल्कि वे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता और जीवंतता का प्रतीक थीं।
उन्होंने अपने जीवन के छह दशक पूरी तरह से लोककला को समर्पित कर दिए। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए पंडवानी की समृद्ध परंपरा को सहेजने वाली एक सशक्त मार्गदर्शक थीं। उनके निधन से लोक संगीत के एक गौरवशाली युग का अंत हो गया है, जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं होगी।यदि आप इस समाचार में कोई विशेष श्रद्धांजलि संदेश या स्थानीय नेताओं के शोक संदेश जुड़वाना चाहते हैं, तो कृपया बताएं।





