छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: बिना तलाक दूसरी महिला के साथ रहने वाले पिता को नहीं मिलेगी बच्चे की कस्टडी

 छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: बिना तलाक दूसरी महिला के साथ रहने वाले पिता को नहीं मिलेगी बच्चे की कस्टडी

राज्य ब्यूरो मोहम्मद आसिफ खान संपादक वीरेंद्र कुमार

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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: बिना तलाक दूसरी महिला के साथ रहने वाले पिता को नहीं मिलेगी बच्चे की कस्टडी

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने बच्चों के संरक्षण और कस्टडी को लेकर एक युगांतकारी निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पिता अपनी पहली पत्नी को तलाक दिए बिना किसी अन्य महिला के साथ रह रहा है, तो वह अपने बच्चे की कस्टडी पाने का नैतिक और कानूनी हकदार नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि बच्चे का कल्याण (Welfare of Child) किसी भी वित्तीय स्थिति से ऊपर है।

नैतिक आचरण और बच्चे का भविष्य सर्वोपरि

मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि बिना तलाक लिए दूसरी महिला के साथ रहना ‘दुराचार’ की श्रेणी में आता है। ऐसी स्थिति में बच्चे को पिता के पास भेजना उसके मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए जोखिम भरा हो सकता है। कोर्ट ने यह भी चिंता जताई कि सौतेली मां से बच्चे को वही स्नेह और सुरक्षा मिल पाएगी या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं है।

पैसा नहीं, प्यार और माहौल है जरूरी

पिता ने अपनी याचिका में दलील दी थी कि वह आर्थिक रूप से अधिक सक्षम है और बच्चे को बेहतर सुविधाएं और शिक्षा प्रदान कर सकता है। इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि केवल आर्थिक संपन्नता कस्टडी का आधार नहीं हो सकती। बच्चे के समग्र विकास के लिए मां का प्यार, सुरक्षित माहौल और भावनात्मक स्थिरता कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

कानून की व्याख्या: संरक्षकता का अधिकार पूर्ण नहीं

अदालत ने हिंदू अल्पसंख्यक एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि हालांकि कानून पिता को प्राकृतिक अभिभावक (Natural Guardian) मानता है, लेकिन यह अधिकार ‘पूर्ण’ या ‘निरपेक्ष’ नहीं है। न्यायालय ने कहा कि कस्टडी तय करते समय कानून से ऊपर बच्चे का सर्वोत्तम हित है।

क्या था मामला?

यह विवाद वर्ष 2013 में शुरू हुई एक शादी से जुड़ा है। दंपति के दो बेटे हैं। आपसी कलह के कारण वर्ष 2021 में पत्नी अपने छोटे बेटे के साथ अलग रहने लगी, जिसके बाद बड़ा बेटा भी मां के पास चला गया। पिता ने बड़े बेटे की कस्टडी के लिए पहले फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। फैमिली कोर्ट द्वारा याचिका खारिज होने के बाद उसने हाई कोर्ट में अपील की थी, जिसे अब उच्च न्यायालय ने भी खारिज कर दिया है।

निष्कर्ष:

हाई कोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया में बच्चे के अधिकारों और उसकी मानसिक शांति को माता-पिता के व्यक्तिगत अधिकारों पर वरीयता दी जाएगी।