बेटी की शादी का खर्च उठाना पिता की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी: बिलासपुर हाई कोर्ट का अहम फैसला

 बेटी की शादी का खर्च उठाना पिता की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी: बिलासपुर हाई कोर्ट का अहम फैसला

राज्य ब्यूरो मोहम्मद आसिफ खान संपादक वीरेंद्र कुमार

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बेटी की शादी का खर्च उठाना पिता की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी: बिलासपुर हाई कोर्ट का अहम फैसला

उप-शीर्षक: डिवीजन बेंच ने पिता की याचिका खारिज कर परिवार न्यायालय के आदेश को रखा बरकरार; कहा- पिता दायित्व से बच नहीं सकते

बिलासपुर, बिलासपुर हाई कोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है, जो बेटियों के अधिकारों और पिता के कर्तव्यों को लेकर एक नज़ीर बन सकती है। जस्टिस संजय के अग्रवाल और जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में साफ तौर पर कहा है कि एक पिता अपनी बेटी के भरण-पोषण और विवाह के खर्च की जिम्मेदारी से किसी भी हाल में पल्ला नहीं झाड़ सकता।

क्या है मामला?

दरअसल, परिवार न्यायालय ने एक मामले में पिता को अपनी बेटी के भरण-पोषण और विवाह के लिए आर्थिक सहायता देने का आदेश दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए पिता ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता पिता का तर्क था कि वह इन खर्चों को वहन करने में सक्षम नहीं है।

हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, डिवीजन बेंच ने परिवार न्यायालय के फैसले को सही ठहराया। हाई कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा, “बेटी के भरण-पोषण के साथ ही विवाह का खर्च उठाना पिता की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी बनती है। पिता अपनी इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।”

याचिका खारिज, फैसला बरकरार

इस टिप्पणी के साथ, डिवीजन बेंच ने पिता द्वारा दायर की गई याचिका को तत्काल प्रभाव से खारिज कर दिया और परिवार न्यायालय द्वारा दिए गए मूल आदेश को बरकरार रखा। हाई कोर्ट का यह फैसला उन तमाम मामलों में एक महत्वपूर्ण दिशानिर्देश के रूप में काम करेगा, जहाँ पिता आर्थिक तंगी या अन्य आधारों पर बेटियों के भविष्य और विवाह से जुड़ी जिम्मेदारियों से मुकरने का प्रयास करते हैं। इस फैसले ने एक बार फिर साबित किया है कि कानून पारिवारिक जिम्मेदारियों के निर्वहन को कितनी गंभीरता से लेता है।