छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट ने 40 साल चला 100 रुपये की रिश्वत का मामला, पलट दिया फैसला

 छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट ने 40 साल चला 100 रुपये की रिश्वत का मामला, पलट दिया फैसला

राज्य ब्यूरो मोहम्मद आसिफ खान संपादक वीरेंद्र कुमार

 

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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 100 रुपये रिश्वत लेने के मामले में 40 साल बाद आरोपी को दोषमुक्त कर दिया है। हाई कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दिए गए 1 साल के कारावास और 1000 हजार रुपये अर्थ डंड के फैसले पलट दिया है। मामले में कर्मचारी को रंगे हाथों पकड़ा गया था।

 

बिलासपुर: साल 1986 में लंबित बिल भुगतान के लिए 100 रुपये रिश्वत लेने के आरोपित एमपीएसआरटीसी रायपुर के वित्त विभाग के बिल सहायक को हाई कोर्ट ने दोषमुक्त कर दिया है। निचली अदालत द्वारा सुनाई गई एक वर्ष की सजा और अर्थदंड को न्यायालय ने निरस्त कर दिया है।

यह है मामला

शिकायतकर्ता अशोक कुमार वर्मा ने वर्ष 1981 से 1985 के दौरान सेवाकालीन बकाया बिल भुगतान के लिए वित्त विभाग के बिल सहायक रामेश्वर प्रसाद अवधिया से संपर्क किया था। आरोप था कि अवधिया ने बिल पारित करने के लिए 100 रुपये की रिश्वत मांगी। इस पर शिकायत लोकायुक्त के पास दर्ज कराई गई।

लोकायुक्त की टीम ने ट्रैप कार्रवाई की योजना बनाई और शिकायतकर्ता को 50-50 रुपये के रासायनिक लगे नोट देकर भेजा। कार्रवाई के दौरान टीम ने अवधिया को रंगे हाथों पकड़कर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया और न्यायालय में चालान पेश किया।

 

निचली अदालत ने यह दिया फैसला

दिसंबर 2004 में निचली अदालत ने अवधिया को दोषी मानते हुए एक वर्ष की कैद और 1000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी।

 

हाई कोर्ट ने यह सुनाया फैसला

अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस बी.डी. गुरु की बेंच ने कहा कि, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947 के तहत दर्ज मामला, अधिनियम 1988 लागू होने के बाद भी विचारणीय है। लेकिन अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि अपीलकर्ता ने वास्तव में अवैध परितोषण की मांग और स्वीकृति दी थी। उपलब्ध मौखिक, दस्तावेजी या परिस्थितिजन्य साक्ष्य से रिश्वतखोरी का अपराध सिद्ध नहीं होता।

 

कोर्ट ने पाया कि अभियोजन अपने साक्ष्य भार को सिद्ध करने में असफल रहा, इसलिए निचली अदालत का दोषसिद्धि आदेश अस्थिर है। इस आधार पर हाई कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि और सजा दोनों को रद्द कर दिया।