छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: हिंदू रीति-रिवाजों को मानने वाले आदिवासियों पर भी लागू होगा हिंदू विवाह अधिनियम

 छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: हिंदू रीति-रिवाजों को मानने वाले आदिवासियों पर भी लागू होगा हिंदू विवाह अधिनियम

राज्य ब्यूरो मोहम्मद आसिफ खान संपादक वीरेंद्र कुमार

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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: हिंदू रीति-रिवाजों को मानने वाले आदिवासियों पर भी लागू होगा हिंदू विवाह अधिनियम

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि अनुसूचित जनजाति (ST) के सदस्य हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन करते हैं, तो उन्हें हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता। जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने जगदलपुर फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक आदिवासी पति और अनुसूचित जाति की पत्नी की आपसी सहमति से तलाक की याचिका को यह कहकर खारिज कर दिया गया था कि यह अधिनियम आदिवासियों पर लागू नहीं होता।

क्या था पूरा मामला?

बस्तर जिले के रहने वाले एक आदिवासी पुरुष और उनकी अनुसूचित जाति की पत्नी की शादी 15 अप्रैल 2009 को हुई थी। साल 2011 में उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, लेकिन आपसी अनबन के कारण दोनों अप्रैल 2014 से अलग रहने लगे। लगभग 20 साल के वैवाहिक रिश्ते के बाद, दोनों ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत जगदलपुर के पारिवारिक न्यायालय में आपसी सहमति से तलाक के लिए अर्जी लगाई थी।

फैमिली कोर्ट ने क्यों खारिज की थी याचिका?

12 अगस्त 2022 को जगदलपुर फैमिली कोर्ट ने आवेदन यह कहते हुए निरस्त कर दिया था कि अधिनियम की धारा-2 के अनुसार, जब तक केंद्र सरकार कोई विशेष अधिसूचना जारी न करे, हिंदू विवाह अधिनियम अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होता। इस फैसले के खिलाफ दंपती ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

हाई कोर्ट की टिप्पणी और फैसला

हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यदि पक्षकार हिंदू परंपराओं का पालन कर रहे हैं, तो वे इस कानून के तहत राहत पाने के हकदार हैं। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के पुराने आदेश को निरस्त कर दिया और स्पष्ट किया कि केवल जनजाति का सदस्य होने मात्र से किसी को इस अधिनियम के लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता, यदि उनके जीवन में हिंदू संस्कारों का समावेश है।