प्रशासनिक संवेदनहीनता की हद: बैंक ने माँगा मृत बहन का सबूत, भाई कंधे पर कंकाल लादकर पहुँचा दफ्तर

 प्रशासनिक संवेदनहीनता की हद: बैंक ने माँगा मृत बहन का सबूत, भाई कंधे पर कंकाल लादकर पहुँचा दफ्तर

राज्य ब्यूरो मोहम्मद आसिफ खान संपादक वीरेंद्र कुमार

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प्रशासनिक संवेदनहीनता की हद: बैंक ने माँगा मृत बहन का सबूत, भाई कंधे पर कंकाल लादकर पहुँचा दफ्तर

केंदुझर (ओडिशा):ओडिशा के केंदुझर जिले से एक ऐसी हृदयविदारक तस्वीर सामने आई है, जिसने मानवता और सरकारी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहाँ के दिआनाली गांव में एक गरीब भाई को अपनी मृत बहन के बैंक खाते से पैसे निकालने के लिए उसकी कब्र खोदकर कंकाल को कंधे पर लादकर बैंक ले जाना पड़ा।

क्या है पूरी घटना?

दिआनाली गांव के रहने वाले जीतू मुंडा की बहन काकरा मुंडा का निधन करीब दो महीने पहले हो गया था। काकरा के बैंक खाते में ₹19,300 जमा थे। अपनी तंगहाली और आर्थिक जरूरतों के कारण जीतू जब पैसे निकालने ‘ओडिशा ग्राम्य बैंक’ की मल्लीपासी शाखा पहुँचा, तो बैंक कर्मियों ने नियमों का हवाला देते हुए भुगतान करने से मना कर दिया। बैंक का कहना था कि या तो वह “कानूनी वारिस” (Legal Heir) होने का प्रमाण पत्र लाए या फिर खाताधारक को खुद उपस्थित होना होगा।

कब्र खोदकर निकाला कंकाल

गरीबी और अशिक्षा के कारण जीतू के पास कोई कानूनी दस्तावेज नहीं थे। बैंक की औपचारिकताओं से हताश होकर उसने अपनी बहन की मौत का “जीवित सबूत” देने का फैसला किया। जीतू ने अपनी बहन की कब्र खोदी, उसके अवशेषों (कंकाल) को एक कपड़े में लपेटा और चिलचिलाती धूप में करीब 3 किलोमीटर तक पैदल चलकर बैंक पहुँच गया।

सोशल मीडिया पर फूटा लोगों का गुस्सा

कंधे पर कंकाल ले जाते जीतू का वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। नेटिजन्स ने बैंक की कार्यप्रणाली और स्थानीय प्रशासन की संवेदनहीनता की जमकर आलोचना की है। लोगों का कहना है कि नियमों के नाम पर एक गरीब को इस हद तक मजबूर करना प्रशासनिक विफलता का चरम है।

पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई

मामला तूल पकड़ते ही स्थानीय पुलिस और प्रशासन हरकत में आया। पुलिस ने बैंक अधिकारियों से बात कर जीतू को उसकी बहन के खाते से पैसे दिलवाने का आश्वासन दिया है। बाद में प्रशासन की देखरेख में बहन के अवशेषों को दोबारा सम्मानपूर्वक दफनाया गया।

यह घटना याद दिलाती है कि भले ही हम डिजिटल इंडिया और बैंकिंग सुधारों की बात करें, लेकिन आज भी ज़मीनी स्तर पर नियमों की जटिलता एक गरीब व्यक्ति के लिए कितनी अपमानजनक और कष्टकारी साबित हो सकती है।